उज्जैन की चौरासी महादेव यात्रा में “डमरुकेश्वर महादेव” वह दिव्य स्थान है जहाँ भगवान शिव ने उत्तम भैरव रूप धारण कर अपने डमरू के नाद से दैत्य-सेना का संहार किया था। यह स्थान दैत्य-विनाश, शक्ति-प्राप्ति और विजय-लाभ का अधिष्ठान माना जाता है। पौराणिक परंपरा के अनुसार शिव के डमरू से उत्पन्न ज्वाला ने महाअसुर वज्रासुर को भस्म कर दिया और उसी ज्वाला से प्रकट हुआ दिव्य लिंग “डमरुकेश्वर” कहलाया।
मान्यता है कि इस लिंग के दर्शन से अश्वमेध यज्ञ, वाजपेय यज्ञ और सहस्र गोदान के समान पुण्य प्राप्त होता है।
|| डमरुकेश्वर महादेव||
(4-84)
पौराणिक कथा — रूद्रासुर, वज्रासुर और देवताओं का आर्त स्वर
कथा की शुरुआत होती है असुर कुल के अत्यंत बलशाली महाअसुर रूद्रासुर और उसके पुत्र वज्रासुर से।
वज्रासुर —
महाबाहु था
अत्यंत बलिष्ठ था
दाँत तेजस्वी और भयानक थे
और निरंतर अपनी शक्तियों को बढ़ाता रहता था
उसने अपनी अत्यधिक शक्ति के बल पर देवताओं को उनके अधिकार-क्षेत्र से हटाकर स्वर्गलोक से बाहर निकाल दिया। देवताओं के संसाधनों पर भी उसने कब्जा कर लिया।
पृथ्वी पर धर्म का विनाश
वज्रासुर के आतंक से —
वेद-पठन बंद हो गए
यज्ञ रुक गए
साधनाएँ नष्ट हो गईं
मानव समाज में हाहाकार मच गया
पृथ्वी अपनी पवित्रता खोने लगी, और देव–ऋषि सभी चिंतित हो उठे।
देव–ऋषियों की साधना और अद्भुत ‘कन्या’ का प्रकट होना
सभी देवता और ऋषि एक स्थान पर एकत्र हुए और वज्रासुर के विनाश हेतु मंत्र-साधना की।
साधना पूर्ण होते ही तेजस्वी प्रकाश से एक दिव्य कन्या प्रकट हुई।
जब उसे ज्ञात हुआ कि उसे वज्रासुर का वध करना है —
वह प्रचंड अट्टाहास कर उठी।
उस अट्टाहास से—
असंख्य कन्याएं प्रकट हुईं
सभी दिव्य, तेजस्वी, योद्धा, और युद्ध-कुशल
इन कन्याओं ने मिलकर वज्रासुर पर भयंकर आक्रमण किया।
शुरुआत में असुर चकित हुए, फिर कमजोर पड़ने लगे।
लेकिन वज्रासुर ने अपनी तामसी माया का उपयोग किया—
और पूरे युद्ध-क्षेत्र का संतुलन बिगड़ गया।
दिव्य कन्या और उसकी सहायक योद्धा कन्याएं भयभीत होकर महाकाल वन में आश्रय लेने लगीं, और वज्रासुर भी अपनी महादानवी सेना के साथ वहाँ पहुँच गया।
नारद मुनि का निवेदन और शिव का उत्तम भैरव रूप
नारद मुनि ने सम्पूर्ण स्थिति को भगवान शिव तक पहुँचाया।
जैसे ही शिवजी ने सुना कि धर्म संकट में है, देवताओं का विनाश निकट है, और असुर महाकाल वन तक पहुँच चुके हैं —
शिवजी ने “उत्तम भैरव” का भयंकर रूप धारण किया।
वे क्रोध से दहकते हुए महाकाल वन पहुँचे।
उन्होंने देखा —
दानवों की विराट सेना
वज्रासुर का घोर अहंकार
और भयभीत दिव्य कन्याएं
उसी क्षण भगवान शिव ने अपने हाथ में डमरू उठाया।
शिव के डमरू का नाद और डमरुकेश्वर लिंग का प्रकट होना
जैसे ही शिवजी ने अपना डमरू बजाया—
आकाश, पृथ्वी और दिशाएँ काँप उठीं
दानवों के हृदय भय से भर गए
देवताओं में नवीन उत्साह जागा
डमरू के प्रचंड नाद से एक दिव्य लिंग उत्पन्न हुआ,
और उसी लिंग से निकली भीषण ज्वाला में वज्रासुर भस्म हो गया।
दानवों की पूरी सेना नष्ट हो गई।
दिव्य कन्याएं मुक्त हो गईं।
चूँकि यह लिंग शिव के डमरू के नाद से प्रकट हुआ था, इसलिए इसका नाम पड़ा —
डमरुकेश्वर महादेव।
डमरुकेश्वर महादेव के दर्शन-लाभ
अश्वमेध सहस्त्र फल
वाजपेय यज्ञ सौगुना पुण्य
सहस्र गोदान के समान परिणाम
युद्ध और संघर्ष में विजय
नकारात्मक ऊर्जा व तामसी शक्ति का नाश
भय, संशय और विघ्नों का अंत
मान्यता है कि डमरुकेश्वर महादेव के दर्शन भर से पाप नष्ट होते हैं और मनुष्य को अदम्य साहस, तेज और रक्षा-शक्ति प्राप्त होती है।
कहाँ स्थित है?
डमरुकेश्वर महादेव मंदिर, उज्जैन के हरसिद्धि मार्ग पर, राम-सीढ़ी के ऊपरी भाग में स्थित है।
चौरासी महादेव परिक्रमा के भक्त यहाँ विशेष रूप से रुककर दर्शन करते हैं।
Vedpuransar
डमरुकेश्वर महादेव शिव के डमरू-नाद की दिव्य शक्ति का प्रत्यक्ष रूप हैं।
यह स्थान हमें बताता है कि जब धर्म संकट में होता है, तब शिव स्वयं अपने विनाश–तत्त्व से संसार की रक्षा करते हैं।
डमरुकेश्वर का दर्शन भय मिटाता है, शक्ति प्रदान करता है और जीवन में विजय का मार्ग खोलता है।
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