स्वर्णज्वलेश्वर महादेव – अग्निपुत्र के तेज से प्रकट दिव्य लिंग (चौरासी महादेव – 6)

स्वर्णज्वलेश्वर महादेव उज्जैन – अग्निपुत्र सुवर्ण की दिव्य कथा जानिए स्वर्णज्वलेश्वर महादेव की पौराणिक कथा, अग्निपुत्र सुवर्ण का जन्म, देव-असुर युद्ध, शिव-कृपा, दर्शन लाभ और उज्जैन में स्थित इस दिव्य लिंग का महत्व।

  || स्वर्णजलेश्वर महादेव ||

(6-84)

उज्जैन की चौरासी महादेव परंपरा में “स्वर्णज्वलेश्वर महादेव” एक अत्यंत विलक्षण और तेजस्वी देवालय है। यह वह स्थान है जहाँ भगवान शिव का अग्नि-तत्त्व प्रत्यक्ष प्रकट होकर महाकाल वन में दिव्य स्वरूप में प्रतिष्ठित हुआ। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह शिवलिंग उस अग्नि-अंश से प्रकट हुआ, जिसे स्वयं भगवान शिव ने त्रैलोक्य-कल्याण हेतु अग्निदेव को प्रदान किया था।

स्वर्ण समान चमकने वाला यह लिंग न सिर्फ तेज का प्रतीक है, बल्कि यह सम्पूर्ण जीवों को शुभत्व प्रदान करने वाला और सभी प्रकार के ग्रह बाधाओं को शांत करने वाला माना गया है।


पौराणिक कथा — अग्नि देव, सुवर्ण पुत्र और देव–असुर संघर्ष

एक समय भगवान शिव और माता पार्वती सौ वर्षों से अधिक समय तक गार्हस्थ्य धर्म में स्थित रहे। फिर भी तारकासुर-वध हेतु आवश्यक दिव्य पुत्र का जन्म नहीं हुआ। देवताओं ने चिंतित होकर अग्नि देव को शिवजी के पास भेजा।

शिवजी का दिव्य अंश अग्नि देव को प्राप्त हुआ

शिवजी ने त्रिलोक कल्याण के लिए अपना दिव्य तेज का एक अंश अग्निदेव को दे दिया।
लेकिन —

  • अग्निदेव उस तेज को सहन न कर पाए,

  • उनका संपूर्ण अस्तित्व उस प्रचंड तेज से जलने लगा,

  • और वे उस तेज-अंश को गंगा में प्रवाहित कर आए।

फिर भी तेज का कुछ भाग अग्निदेव के भीतर शेष रहा, और उसी से एक अत्यंत कांतिमान, ज्वलंत, स्वर्ण-वर्ण पुत्र उत्पन्न हुआ —
जिसे पौराणिक ग्रंथों में “सुवर्ण” कहा गया है।

सुवर्ण पुत्र के लिए देव–असुर संघर्ष

सुवर्ण बालक की तेजस्वी कांती ऐसी थी कि —

  • देवता

  • दैत्य

  • गंधर्व

  • यक्ष

सभी उस दिव्य बालक को पाने के लिए युद्ध करने लगे।
भयंकर युद्ध का कोलाहल बढ़ गया। देवताओं में भय फैलने लगा।

समस्त देव शिवजी के पास पहुँचे

ब्रह्मा, इन्द्र, बृहस्पति और बालखिल्य ऋषि मिलकर शिवजी के पास पहुँचे और पूरा वृत्तांत सुनाया।

भगवान शिव ने कहा कि यह सर्वनाश सुवर्ण के प्रभाव से हुआ है, अतः इसे ब्रह्महत्या-दोष का अनुभव करना होगा और छेदन–दहन–घर्षण की पीड़ा भी सहनी होगी।

यह सुनकर अग्नि देव भयभीत हो गए। उन्होंने शिवजी की स्तुति की और बोले:

 

“प्रभो! यह पुत्र आपकी कृपा से मिला है, कृपया इसे अपने संरक्षण में ले लें।”

शिवजी का करुणा रूप — महाकाल वन में दिव्य प्रतिष्ठा

शिवजी ने सुवर्ण को गोद में बैठा लिया, उसे स्नेह देकर शांत किया और कहा—

“तुम महाकाल वन में प्रतिष्ठित रहो, और वहीं मेरी दिव्य ज्वाला-शक्ति का केंद्र बनो।”

कर्कोटक नाग के दक्षिण में जहाँ यह तेज प्रकट हुआ, वही स्थान बाद में
स्वर्ण-ज्वला-ईश्वर
या
स्वर्णज्वलेश्वर महादेव
के नाम से विख्यात हुआ।


स्वर्णज्वलेश्वर महादेव का महत्व व दर्शन–लाभ

ज्वाला रूप शिवलिंग — तेज, ऊर्जा, प्रकाश तथा अग्नि-तत्त्व का प्रतीक।
सुभ-कार्यों की सिद्धि — कहा गया है कि सुवर्ण वस्तु के दान के साथ इस लिंग के दर्शन शुभ फल प्रदान करते हैं।
ग्रहरोग और बाधा शांति — अग्नि तत्त्व अत्यंत शक्तिशाली माना गया है; इसका पूजन सभी प्रकार की नकारात्मकता दूर करता है।
श्रावण मास व चतुर्थी का विशेष महत्व — इन दिनों पूजा अधिक फलदायी मानी गई है।

मान्यता है कि जो भक्त निष्ठा से यहाँ पूजन करता है, उसके जीवन में धन, तेज, ऊर्जा, और सभी कार्यों में सफलता बढ़ती है।


कहाँ स्थित है?

स्वर्णज्वलेश्वर महादेव मंदिर, उज्जैन के राम सीढ़ी क्षेत्र में, ढुंढेश्वर महादेव के बिल्कुल समीप स्थित है।
चौरासी महादेव परिक्रमा के दौरान यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।


 Vedpuransar

स्वर्णज्वलेश्वर महादेव की कथा यह सिद्ध करती है कि भगवान शिव के प्रत्येक लिंग का अपना विशिष्ट महातत्त्व है। यह स्थान शिव के तेज, ऊर्जा और सृजन शक्ति का दिव्य रूप है।
दर्शन मात्र से मन के दोष दूर होते हैं, शुभता बढ़ती है, और मनुष्य नई शक्ति प्राप्त करता है।


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